बांग्ला मातृभाषा के लिए हुए बलिदान को किया गया याद, भाषा आंदोलन के इतिहास पर हुई चर्चा
धनबाद में शिल्पे अनन्या पत्रिका के संपादक प्रो. डॉ. दीपक कुमार सेन के आवास पर हुआ आयोजन
Dhanbad News: धनबाद के लुबि सर्कुलर रोड स्थित प्रो. डॉ. दीपक कुमार सेन के आवासीय कार्यालय में सोमवार संध्या शिलचर भाषा आंदोलन की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इस आयोजन का उद्देश्य उन 11 शहीदों को याद करना था जिन्होंने मातृभाषा बांग्ला के अधिकार की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह सभा ‘शिल्पे अनन्या’ त्रैमासिक बंगला पत्रिका की ओर से आयोजित की गई, जिसके संपादक प्रो. सेन स्वयं हैं।
शहीदों की तस्वीर पर पुष्प अर्पण कर दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की शुरुआत शहीदों की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करके की गई। प्रो. डॉ. सेन ने अपने संबोधन में बताया कि 19 मई 1961 को शिलचर रेलवे स्टेशन पर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे बांग्लाभाषी युवाओं पर असम राइफल्स ने गोलीबारी की, जिसमें 11 लोग शहीद हो गए थे। यह आंदोलन असम सरकार द्वारा बांग्ला भाषा को दरकिनार करने के निर्णय के खिलाफ था। इसी बलिदान के चलते बाद में शिलचर क्षेत्र में बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिला।
भाषा आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ और वैश्विक उदाहरण पर चर्चा
प्रो. सेन ने यह भी बताया कि 1952 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में भी मातृभाषा बांग्ला के लिए युवाओं ने बलिदान दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि पुरुलिया (पूर्व में मानभूम) क्षेत्र को भी बंगाल में मिलाने के लिए 1912 से 1956 तक लंबा आंदोलन चला। यह सारे उदाहरण दुनिया के उन अनूठे आंदोलनों में शामिल हैं जहाँ मातृभाषा के लिए लोग अपने जीवन तक न्योछावर कर देते हैं।
ज्ञान-विज्ञान समिति और अन्य वक्ताओं ने भी साझा किए विचार
कार्यक्रम में भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. काशी नाथ चटर्जी ने भी भाग लिया और मातृभाषा की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भाषा का समन्वय ही भाषा का विकास है। वहीं बरनाली गुप्ता ने कहा कि बंगाली समाज को गर्व है कि उसने भाषा के लिए बलिदान दिया। वंदना चौधरी ने बांग्ला स्कूलों में घटते छात्रों की चिंता जताई और कहा कि बच्चों को अपनी भाषा से जोड़ने की ज़रूरत है।
झारखंड सरकार से मातृभाषा शिक्षा की मांग
वक्ताओं ने झारखंड सरकार से यह मांग की कि राज्य की 12 मान्यताप्राप्त भाषाओं को विद्यालय स्तर से पढ़ाई में शामिल किया जाए। भोला नाथ राम ने बताया कि ज्ञान विज्ञान समिति मातृभाषा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सरोकारों पर निरंतर काम कर रही है और आने वाले समय में इस दिशा में और मजबूती से आगे बढ़ेगी।
निष्कर्ष
शिलचर भाषा आंदोलन की स्मृति मातृभाषा के सम्मान और अधिकार का प्रतीक
शिलचर भाषा आंदोलन एक ऐसा ऐतिहासिक प्रसंग है, जिसने यह सिद्ध किया कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रतीक होती है। धनबाद में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा हमें याद दिलाती है कि भाषा के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। साथ ही यह आयोजन वर्तमान पीढ़ी को मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूक करने का एक सार्थक प्रयास था।
