Taslima Nasrin Controversy | पहलगाम और ढाका हमले की तुलना करते हुए दिया कट्टरपंथ पर तीखा बयान
Islam and Terrorism Statement: “आतंकवाद तब तक रहेगा जब तक इस्लाम रहेगा” – दिल्ली लिटरेचर फेस्ट में तस्लीमा नसरीन का बड़ा दावा
Islam and Terrorism Statement: निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने दिल्ली में आयोजित एक लिटरेचर फेस्टिवल में इस्लाम और आतंकवाद को लेकर विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जब तक इस्लाम रहेगा, तब तक आतंकवाद भी जीवित रहेगा। तस्लीमा ने पहलगाम आतंकी हमले और 2016 के ढाका हमले की तुलना करते हुए कहा कि यह घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि आस्था जब तर्क और मानवता से ऊपर हो जाती है, तब आतंकवाद जन्म लेता है।
1400 वर्षों में नहीं हुआ इस्लाम का विकास: तस्लीमा
तस्लीमा ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस्लाम पिछले 1400 सालों में भी विकसित नहीं हुआ है, और यह कट्टरपंथियों को जन्म देता आ रहा है। उन्होंने बताया कि ढाका हमले में मुसलमानों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया था क्योंकि वे ‘कलमा’ नहीं पढ़ पाए थे। उनके अनुसार, धर्म की अंधश्रद्धा जब तर्क को कुचल देती है, तब दुनिया खून में डूब जाती है।
“हर जगह मस्जिदें बन रही हैं, लेकिन जरूरत शिक्षा की है”
अपने भाषण में तस्लीमा ने यह भी टिप्पणी की कि यूरोप में जहां चर्च अब संग्रहालय बन चुके हैं, वहीं मुसलमान लगातार नई मस्जिदें बनाने में लगे हैं। उन्होंने कहा, “हजारों मस्जिदें पहले से मौजूद हैं, लेकिन फिर भी और बनाना चाहते हैं। वे जिहादी तैयार कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि मदरसे बंद होने चाहिए और बच्चों को सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि सभी किताबें पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
भारत को बताया अपना “दूसरा घर”, समान नागरिक संहिता का समर्थन
तस्लीमा नसरीन ने भारत को लेकर भावुकता प्रकट करते हुए कहा कि “भारत मुझे घर जैसा लगता है।” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में 10 वर्षों तक रहने के बावजूद उन्हें वहां बाहरी व्यक्ति जैसा अनुभव होता था। वहीं कोलकाता और दिल्ली में उन्हें अपनापन महसूस होता है।
इसके साथ ही उन्होंने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का भी समर्थन किया और कहा कि “हर सभ्य देश में एक समान कानून होना चाहिए।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस्लामी पितृसत्तात्मक सोच कुरान के अनुसार अधिकार चाहती है, जबकि अधिकार धार्मिक नहीं, मानवीय होने चाहिए।
निष्कर्ष
तस्लीमा नसरीन का बयान एक बार फिर वैचारिक टकराव और सामाजिक बहस को जन्म दे रहा है। जहां कुछ लोग इसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति का साहसिक उदाहरण मानते हैं, वहीं कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला मान सकते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधताओं से भरे देश में इस तरह की चर्चाएं समाज को सोचने की दिशा जरूर देती हैं, बशर्ते उनका उद्देश्य सुधार हो, विघटन नहीं।
