Sub-classification Doesn’t Question Reservation’s Success: आरक्षण की सफलता पर नहीं उठता सवाल, बल्कि वंचितों को न्याय दिलाता है उपवर्गीकरण – CJI बी.आर. गवई

आरक्षण की सफलता पर नहीं उठता सवाल, बल्कि वंचितों को न्याय दिलाता है उपवर्गीकरण – CJI बी.आर. गवई

आरक्षण की सफलता पर नहीं उठता सवाल, बल्कि वंचितों को न्याय दिलाता है उपवर्गीकरण – CJI बी.आर. गवई

पिछड़े वर्गों के भीतर न्यायपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित करना संवैधानिक लक्ष्य : भारत के मुख्य न्यायाधीश का बयान

Sub-classification Doesn’t Question Reservation’s Success: सामाजिक न्याय को और गहराई देने की दिशा में महत्वपूर्ण टिप्पणी

Sub-classification Doesn’t Question Reservation’s Success: भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पिछड़े वर्गों (OBC) के भीतर उपवर्गीकरण (Sub-classification) का उद्देश्य आरक्षण की सफलता को चुनौती देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जो वर्ग अत्यधिक वंचित हैं, उन्हें उनका न्यायोचित हिस्सा मिल सके।

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समानता और अवसर की अवधारणा को मजबूत करता है उपवर्गीकरण

CJI गवई ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना है। लेकिन यह भी देखा गया है कि पिछड़े वर्गों के भीतर भी कुछ समुदाय अपेक्षाकृत अधिक लाभान्वित हुए हैं, जबकि कुछ अन्य अब भी हाशिये पर हैं। ऐसे में उपवर्गीकरण का विचार इन्हीं हाशिये पर रह गए वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने का संतुलित और संवैधानिक उपाय है।

संविधान के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है उपवर्गीकरण

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी जोड़ा कि उपवर्गीकरण की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15(4), 16(4) के तहत पूर्णत: वैध है। यह उन लोगों तक अवसरों को पहुँचाने का प्रयास है, जिन तक अब तक वे नहीं पहुँच सके हैं।

अदालतों ने भी दी है उपवर्गीकरण को मान्यता

इस संदर्भ में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती फैसलों का भी उल्लेख किया, जिसमें अदालत ने माना था कि पिछड़े वर्गों के भीतर उपवर्गीकरण करके लाभों का समान वितरण किया जा सकता है, जिससे आरक्षण नीति अधिक न्यायसंगत बन सके।

निष्कर्ष

CJI बी.आर. गवई का यह बयान न केवल आरक्षण व्यवस्था की पुनर्परिभाषा की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि उपवर्गीकरण सामाजिक न्याय की गहराई को छूने की कोशिश है, न कि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाने की। आने वाले समय में यह विचार देश के आरक्षण ढांचे में और अधिक न्यायपूर्ण संतुलन ला सकता है।

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