लक्ष्मी नारायण महायज्ञ: Lakshmi Narayan Mahayagya और Radha Krishna Pran Pratishtha के साथ होगी भागवत कथा, कलश यात्रा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
लक्ष्मी नारायण महायज्ञ: सिंदरी स्थित पावन तीर्थस्थल मीरा मोहन धाम में 2 मई 2025 से सप्त दिवसीय श्री श्री 108 लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का भव्य आयोजन प्रारंभ हो गया है। यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समुच्चय है, बल्कि अध्यात्म, संस्कृति और भक्ति का एक दिव्य संगम भी है। महायज्ञ के दौरान राधा-कृष्ण की प्राण प्रतिष्ठा, श्रीमद्भागवत कथा, भजन संध्या और वैदिक परंपराओं के अनुरूप विविध आयोजन किए जाएंगे।
कलश यात्रा से हुआ शुभारंभ
2 मई की सुबह कार्यक्रम की शुरुआत एक भव्य कलश यात्रा के साथ हुई। इस कलश यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में भक्तिपूर्वक भाग लिया। यह यात्रा शहरपुरा के मुख्य मार्गों से गुजरती हुई यज्ञ स्थल मीरा मोहन धाम पहुंची, जहाँ वैदिक रीति से पूजा-अर्चना की गई।
राधा-कृष्ण की प्राण प्रतिष्ठा
महायज्ञ के अंतर्गत भगवान राधा-कृष्ण की प्राण प्रतिष्ठा अत्यंत विधिपूर्वक की जाएगी। खासतौर से निर्मित सुंदर प्रतिमाओं में वैदिक मंत्रों और आचार्यगण की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठा संपन्न की जाएगी, जिससे यह स्थान स्थायी आराधना स्थल बन जाएगा।
भागवत कथा का दिव्य रस
पूरे सप्ताह चलने वाली श्रीमद्भागवत कथा में प्रसिद्ध कथा वाचकों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े प्रेरणादायी प्रसंग सुनाए जाएंगे—जैसे कृष्ण जन्म, रासलीला, गोवर्धन पूजा, भक्त प्रहलाद की कथा आदि। कथा प्रतिदिन दो सत्रों में होगी—दोपहर और संध्या को, जिससे अधिक से अधिक श्रद्धालु धर्मलाभ प्राप्त कर सकें।
भजन-संध्या और सांस्कृतिक संध्या
हर शाम को भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा, जिसमें स्थानीय व बाहर से आमंत्रित कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देंगे। भक्तिमय वातावरण में गूंजते भजन श्रद्धालुओं को अध्यात्मिक शांति एवं आनंद का अनुभव कराएंगे।
आयोजन समिति की अपील
इस दिव्य आयोजन के आयोजक गौरव वक्ष (उर्फ लक्की सिंह) ने क्षेत्र के समस्त श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि वे प्रतिदिन शाम 6:00 बजे परिवार सहित इस पावन आयोजन में भाग लें और सत्संग, कथा और भक्ति के माध्यम से जीवन को पुण्यमय बनाएं।
निष्कर्ष
मीरा मोहन धाम, शहरपुरा सिंदरी में आयोजित यह Lakshmi Narayan Mahayagya न केवल धार्मिक और वैदिक परंपराओं को जीवित रखता है, बल्कि समाज में अध्यात्म और संस्कारों की ऊर्जा भी संचारित करता है। श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर आत्मिक शांति, भक्ति और जीवन मूल्यों से जुड़ने का एक उत्तम मंच है।
