Dhanbad News: झारखंड में Bangla Language Promotion को लेकर ज्ञापन, धनबाद उपायुक्त को सौंपा गया विरोध पत्र

झारखंड में Bangla Language Promotion को लेकर ज्ञापन

झारखंड में Bangla Language Promotion को लेकर ज्ञापन

बंगाली समाज ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी का नाम बदलने और बांग्ला भाषा उपेक्षा पर जताई नाराजगी

बंगाली समाज की भावनाओं पर आघात: समिति ने उठाई आवाज

Dhanbad News: धनबाद में गुरुवार को Bangla Language Promotion in Jharkhand को लेकर झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति ने उपायुक्त माधवी मिश्रा को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन का नेतृत्व समिति के सभापति सुजीत रंजन ने किया। समिति ने बांग्ला भाषा के प्रति राज्य सरकार और शिक्षा मंत्रालय के रवैये पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इसे बंगाली समाज की उपेक्षा बताया।

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शिक्षा मंत्री की बांग्ला भाषा को लेकर उदासीनता पर विरोध

समिति के प्रवक्ता ने बताया कि ज्ञापन का मुख्य उद्देश्य शिक्षा मंत्री द्वारा बांग्ला भाषा और बांग्ला पुस्तकों को स्कूली पठन-पाठन में शामिल करने में दिखाई गई अनिच्छा का विरोध करना था। उनका कहना था कि बंगालियों की मातृभाषा को शिक्षा व्यवस्था में स्थान न देना संविधान की भावना और सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी का नाम बदलने पर गहरी आपत्ति

ज्ञापन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी का नाम बदले जाने पर भी आपत्ति दर्ज की गई। समिति के अनुसार, डॉ. मुखर्जी न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि बांग्ला भाषा और संस्कृति के प्रबल समर्थक भी थे। उनका नाम हटाना बंगाली समाज की अस्मिता और गौरव पर सीधा आघात है। प्रवक्ता ने कहा, “हमें नाम से आपत्ति नहीं है, लेकिन इतिहास को मिटाना किसी भी समाज के लिए अपमानजनक है।”

ज्ञापन सौंपने में समाज के कई प्रमुख लोग रहे शामिल

इस ज्ञापन के दौरान समिति के संस्थापक बेंगू ठाकुर, भवानी बनर्जी, गोविंदो ठाकुर, समीर सरकार, पप्पू सूत्रधर और पार्थो सारथी दत्ता जैसे प्रमुख सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर मांग की कि राज्य सरकार बांग्ला भाषा को सम्मान दे और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महापुरुषों की स्मृति को संरक्षित रखे।

निष्कर्ष

Bangla Language Promotion in Jharkhand आज केवल एक भाषाई मांग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक सम्मान की लड़ाई बन चुकी है। झारखंड में रह रहे बंगाली समुदाय की भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार को संवाद और समाधान की ओर सकारात्मक कदम उठाने चाहिए, जिससे सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विविधता बनी रहे।