Katras के लखन मिस्त्री: कतरास के लखन विश्वकर्मा उर्फ़ लखन मिस्त्री को कौन नहीं जानता! उनका नाम आते ही बरबस विश्वकर्मा पूजा से जुड़ी वो अद्भुत कला-कृतियाँ आँखों के सामने तैरने लगती हैं। भले ही लखन मिस्त्री आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कला, परंपरा और यादें अब भी कतरास कोयलांचल वासियों के दिलों में जिंदा हैं। विश्वकर्मा पूजा के इस शुभ अवसर पर वार्ता संभव की पूरी टीम उन्हें नमन और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
🌟 60 साल पुरानी थीम-आधारित कला की शुरुआत

करीब छह दशक पहले, कतरास के पंचगढ़ी स्थित स्वस्तिक सिनेमा रोड पर स्थित अपनी दुकान से लखन मिस्त्री ने विश्वकर्मा पूजा को एक नया आयाम दिया। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति स्थापना को थीम-आधारित भारतीय कला और संस्कृति के संगम से जोड़ा। सिर्फ मूर्ति बनाना ही नहीं, बल्कि समाज की कुरीतियों पर चोट करने वाली रचनाओं को भी अपने शिल्प में शामिल किया।
👏 विरासत को जीवंत रखते उत्तराधिकारी
लखन मिस्त्री के बाद उनके पुत्र दिवंगत रामस्वरूप विश्वकर्मा ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आज उनके पोते – बबलू विश्वकर्मा, टिंकू विश्वकर्मा, छोटू विश्वकर्मा, रामावतार विश्वकर्मा और जीतेन्द्र विश्वकर्मा – उसी विरासत को जीवंत रखे हुए हैं। हर साल नई थीम और नये संदेश के साथ भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति सजाई जाती है, जहाँ कला और संस्कृति का अनूठा संगम लोगों को आकर्षित करता है।
🎉 कला केंद्र बना आकर्षण का केंद्र
इस वर्ष भी परिवार ने अपने दादा लखन मिस्त्री की याद में एक नई थीम पर आधारित भगवान विश्वकर्मा की भव्य मूर्ति स्थापित की। यहाँ न सिर्फ पूजा, बल्कि भारतीय कला और संस्कृति का जोहर प्रस्तुत किया जा रहा है। बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग – हर उम्र और वर्ग के लोग इस अद्भुत कृति को देखने के लिए पहुँच रहे हैं।
🏵️ दुर्गा पूजा में भी कला का जादू
लखन मिस्त्री के परिवार द्वारा रानी बाजार दुर्गा पूजा मेले में भी “विश्वकर्मा कला केंद्र” के नाम से शानदार प्रदर्शनी लगाई जाती है। यहाँ की रचनात्मकता श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। इस बार की दुर्गा पूजा में भी लोग बेसब्री से नई कलाकृतियों का इंतज़ार कर रहे हैं।
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